Samadhan Episode  926        Experience Sharing – B.K. Mrityunjay Bhai

CONTENTS :

  1. जैसे कोई unknown व्यक्ति आपसे टेलीफोन के द्वारा सम्पर्क करता है, जब मैं योग में बैठता था मुझे एसा ही अनुभव हो रहा था|
  2. इस ईश्वरीय शिक्षा में आने के बाद में पता चला कि परमात्मा सर्वव्यापी नहीं सर्वशक्तिमान है| सूर्य एक जगह रहकर पूरे विश्व को प्रकाशित करता है, तो परमात्मा को भी सर्वव्यापी होने की आवश्यकता नहीं है|
  3. मैं उनको समझ सकता हूँ, देख सकता हूँ, अनुभव कर सकता हूँ, communicate कर सकता हूँ, ऐसा अनुभव हुआ|
  4. पवित्रता है तो सुख-शांति की अनुभूति है, पवित्रता एकाग्रता की शक्ति को बढ़ाती है| पवित्रता साइलेंस में रहने की विधि है|

रुपेश कईवर्त  :    कहते हैं कि इत्र या perfume से शरीर या कपड़े को महकाना कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात तब है जब हमारे किरदार से खुशबू आये, हमारे व्यवहार से, हमारे संस्कार से खुशबु आये| आध्यात्मिक विभूति जो होते हैं, उनके जीवन से भी ऐसे ही खुशबू आती है|

आज हमारे साथ हैं आदरणीय ब्रह्माकुमार राजयोगी मृत्युंजय भाईजी, जो कि ब्रह्माकुमारिस ईश्वरीय विश्विद्यालय के education wing के चेयरपर्सन हैं| साथ ही साथ आप डायरेक्टर हैं clean the mind and green the earth, जो एक ग्लोबल प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है ब्रह्माकुमारिस के द्वारा| आप नेशनल कोऑर्डिनेटर हैं living values, एक प्रोजेक्ट जोकि बच्चों के लिए चलाया जा रहा है, जिसे UNICEF और UNESCO का समर्थन है|

आप कैसे इतना सारा कार्य मैनेज कर लेते हैं? generally, लोग stressed हो जाते हैं आप कैसे मैनेज करते हैं इन सबको?

बी.के. मृत्युंजय भाईजी :         मुझे ईश्वरीय ज्ञान में आये हुए करीब 50 साल हो गये हैं| पहली बार 1968 में बैंगलोर में मैंने ये शिक्षा प्राप्त की थी, उस समय में फाइनल इयर में पढ़ रहा था| ज्ञान प्राप्त करने के बाद मेरे जीवन की अनेक समस्याओ का समाधान मुझे प्राप्त हुआ| इस ईश्वरीय विश्वविद्यालय में जीवन में आने वाले अनेक challenges के लिए एक आध्यात्मिक शक्ति, मनोबल, बुद्धिबल, ज्ञानबल, जीवन में दैविगुणों का बल प्राप्त होता है|

उसी प्राप्ति के आधार पर मैंने इस ईश्वरीय सेवा में अपना जीवन समर्पण करने का निश्चय किया| हर व्यक्ति के सामने जितनी भी समस्या है, उन सबका समाधान इस ईश्वरीय ज्ञान में है| इसे हम दूसरे शब्दों में कहते हैं त्रिकालग्य| मतलब जहाँ आदि मध्य अंत, कर्म अकर्म विकर्म को समझने का ज्ञान मिलता है| साथ में जीवन से कमी-कमज़ोरी को दूर करने के लिए योग की शिक्षा प्राप्त होती है|

बचपन से वा अनेक जन्मो से, समाज से, वातावरण से, वा अनेक समस्याओं से मनुष्य के अंदर प्रेरणा भी हो सकती है और समस्या भी हो सकती है| इन सभी समस्या का यहाँ हमे समाधान मिलता है| इन समस्याओं को देखते हुए मैंने ये निश्चय किया कि इस ईश्वरीय शिक्षा को जन-जन तक पहुँचाना हमारा कर्तव्य है|

रुपेश कईवर्त  :    19 साल की आयु में ही एक बड़ा निर्णय ले लेना, जीवन समर्पण करने का| क्या खास वजह आपको लगी? भले से ही आपको सत्य की तलाश थी, पारिवारिक बैकग्राउंड ऐसा आध्यात्मिक था जिसने आपको मदद की इस मार्ग में आगे बढने में!

बी.के. मृत्युंजय भाईजी :         लौकिक में हमारा परिवार किसी न किसी धार्मिक प्रवृत्तियों से जुड़ा हुआ था| हमारे घर में समय प्रति समय स्वामी लोग आते रहे हैं| मुझे उन सभी के नजदीक आने का अवसर मिला| और एक पारिवारिक सहयोग भी मिला| उसके कारण बचपन में ही आध्यात्मिकता की नींव मेरे अंदर पड़ गई थी| एक आध्यात्मिक परिवार में जन्म लेने के कारण मुझे दीक्षा मिली, जिसमे हमे योग सिखाया जाता था, जिसमे शिवलिंगम की पूजा करते हैं|

ये कर्नाटका में एक कम्युनिटी है| शिवयोग मेरे जीवन में एक अंग बना हुआ था| इसलिए मुझे यहाँ राजयोग बहुत ही सहज लगा| ईश्वरीय विश्वविद्यालय में भी एक परमात्मा शिव का ज्ञान दिया जाता है और उसी ज्ञान के कारण मैने ख़ुशी और अपनत्व का अनुभव किया|

रुपेश कईवर्त  :    क्या आपको भी कुछ खास अनुभूति रही कि जिस परमात्मा की मैं पूजा कर रहा हूँ वो परमात्मा यही है!

बी.के. मृत्युंजय भाईजी :          मैं अपने जीवन में यही ढूंढ रहा था – परमात्मा कौन है? कहाँ है? जिस पर हम इतना विश्वास करते हैं, किताबों में उनकी महिमा पढ़ते हैं, जिसका जीवन में कोई अनुभव नहीं था| इस ईश्वरीय विद्यालय में आने के बाद तीसरे दिन मुझे एक अनोखा अनुभव हुआ| जैसे कोई unknown व्यक्ति आपसे टेलीफोन के द्वारा सम्पर्क करता है, उससे बात करके ऐसा महसूस होता है, कि कोई व्यक्ति मुझसे बात कर रहा है|

जब मैं योग में बैठता था मुझे एसा ही अनुभव हो रहा था| अनुभव के कारण ही मेरा मन मुझे खींच-खींच कर इस ईश्वरीय विद्यालय में ले आया| योग में बेठने की मुझे आदत हो गई| उस आदत ने मुझे कई अलौकिक अनुभव करवाए, परमशान्ति को अनुभव किया, और एक नयी सोच की तरफ़ अग्रसर हुआ| ये शिक्षा एक अमूल्य खजाना, रत्न है| प्रातःक्लास जिसे हम मुरली class भी कहते हैं, जहाँ ईश्वर के महावाक्य सुनाते हैं, मुझे ये सुनने का मौका मिला|

उस समय मुझे हिंदी बिलकुल नहीं आता था, क्योंकि मेरा जन्म कर्नाटका का था| हमे सिर्फ़ कन्नड़ और इंग्लिश ही आता था| फ़िर भी मुरली की कुछ पॉइंट्स भाई-बहन मुझे ट्रांसलेट करके सुना देते थे| उन पॉइंट्स को सुनने के बाद ऐसा लगता था कि मेरे दिल को तीर लग रहा है| ऐसा लगा जैसे किसीने शांति का, पवित्रता का तीर मारा, जिससे मेरे जीवन में एक नयी स्फूर्ति, ख़ुशी, शांति की लहरें आयी| यही कारण है कि मैं इधर आया|

परन्तु आपको मालूम होगा कि जो सामान्य युवा जब ज्ञान में आते हैं तब, लौकिक में लोगों को थोड़ी चिंता हो जाती है कि पता नही कोनसी संस्था, संगठन में चला गया होगा! कहीं हमारे परिवार से दूर न हो जाए! अब इनका भविष्य क्या होगा! और ये स्वभाविक है| परिवार में मात-पिता, भाई-बहन को चिंता होती है| उन्होंने मुझसे अनुरोध किया कि इधर मत जाओ, ये उम्र नहीं है यहाँ जाकर अपना समय व्यतीत करने की, अभी तुम्हे जीवन में आगे बढ़ना है|

पहले तो हमे सलाह दी फ़िर जब मैं deep में जाने लगा तो विरोध किया| इस तरह परिवार में, friend सर्किल में एक वातावरण बन गया कि ये ईश्वरीय विश्विद्यालय में जाकर अपना समय व्यतीत करते हैं| परन्तु मुझे एक अनुभूति है कि seeing is believing कहा जाता है| experience is power कहा जाता है| दुनियाभर के लोग भगवान के बारे में सोचते, उनकी आराधना करते, किताब पढ़ते, परन्तु फ़िर भी उनका अनुभव नहीं है|

मेरे जीवन में अनुभव होने के कारण, मैने उस समस्या को शांतिपूर्वक सम्भाला| मैने कहा –  ये ईश्वरीय ज्ञान सभी मनुष्यों के लिए आवश्यक है, परन्तु जब समय होगा, तब आप सब भी पहचान जायेंगे, इसलिए मेरा विरोध मत करो| इस तरह शांतिपूर्वक मैने समझाया और इस बंधन से मुझे मुक्ति मिली|

रुपेश कईवर्त  :    आगे चल कर क्या उन्होंने आपका सपोर्ट किया? ये स्वीकार किया कि जो मार्ग आपने चुना है वो मार्ग सचमुच बिलकुल सही है?

बी.के. मृत्युंजय भाईजी :          सपोर्ट तो किया लेकिन उससे पहले कुछ प्रलोभन भी दिया कि आपको इस मार्ग पर ही चलना है तो क्यों न एक संत, स्वामीजी बन करके चलो| इसके लिए एक वट में लेकर गये, उसमे आज भी एक स्वामीजी की आयु 111 साल है| उस समय वो मुझे अपना उत्तराधिअकारी बनाने के लिए बोले थे| उन्होंने कहा कि ये बहुत ही सहज मार्ग है इसमें आपको मान सम्मान मिलेगा| उस समय ज्यादा लोग ईश्वरीय विश्वविद्यालय को नहीं जानते थे| भारत में भी इतना नहीं था|

मैने सोचा कि ये महात्मा, साधू, संत तो हर जगह हैं, परन्तु जो ये ईश्वरीय शिक्षा है ये सभी संतो, महात्माओ को आगे चल करके अनुभव कराने के लिए एक विधि बन सकती है| मैने कहा मुझे क्षमा करना, मेरा विचार साधू-संत बनने का नहीं है| ऐसे कह करके अपने परिवार वालों को मैने समझाया| उन्होंने सोचा मेरा interest इस side है इसलिए उन्होंने थोडा विरोध करके छोड़ दिया|

रुपेश कईवर्त  :    मैं जानना चाहूँगा कि क्या ठोस अनुभूति आपको हुई योग में, और ज्ञान की ऐसी कोनसी बात थी जिसने आपको छू लिया था, जिसके कारण इतनी बड़ी-बड़ी प्राप्तियां को आपने छोड़ा और जिसने आपका मन स्थिर रखा और आपको इस मार्ग में आगे बढ़ाया?

बी.के. मृत्युंजय भाईजी :         सबसे बड़ी अनुभूति जो मुझे हुई वो ये थी कि लोगों का ये मनना था कि परमात्मा सर्वव्यापी है, मैं भी इसी विश्वास का एक अंग था, परन्तु इस ईश्वरीय शिक्षा में आने के बाद में पता चला कि परमात्मा सर्वव्यापी नहीं सर्वशक्तिमान है| सूर्य एक जगह रहकर पूरे विश्व को प्रकाशित करता है, तो परमात्मा को भी सर्वव्यापी होने की आवश्यकता नहीं है| वो सर्वशक्तिमान है और वो ज्ञान देता है|

जब मनुष्य सृष्टि में अज्ञान फेलता है, तो उसका परिणाम जीवन में समस्या आ जाती है| उस समय वो अवतरित हो करके ज्ञान देता है| ये सब मैने गीता में भी सुना था परन्तु इसका इतना अनुभव नहीं था| परन्तु इस ईश्वरीय विद्यालय में आने के बाद, ईश्वर सर्वशक्तिमान है सर्वव्यापी नहीं है, इस बात का मुझे अनुभव हुआ| परमात्मा त्रिलोकीनाथ है इस बात का अनुभव हुआ क्योंकि तीनों लोकों का ज्ञान पुस्तकों में वर्णित है पर कभी उसका अनुभव नहीं हुआ| यहाँ आने के बाद एक तरह से मेरा तीसरा नेत्र खुल गया|

मैं उनको समझ सकता हूँ, देख सकता हूँ, अनुभव कर सकता हूँ, communicate कर सकता हूँ, ऐसा अनुभव हुआ| ये अनुभव मेरे लिए अमूल्य रत्न रहे और साथ-साथ अगर आज कोई भी समस्या है तो उसका कारण अपवित्रता, अशुद्धता, अज्ञानता है| और कोई चाहे स्वयम का संस्कार हो, परिसर का वायुमंडल हो, भोगवाद का विचार हो, ये सभी विचार एक नई समस्या को जन्म देता है|

परन्तु ये ईश्वरीय शिक्षा मनुष्यों को उन सब से मुक्ति दे करके एक नये रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है| इसके लिए नॉलेज एक नया संस्कार धारण करने के लिए, नये व्यक्तित्व का निर्माण करने के लिए, नए सोच को विकसित करने के लिए, और नये सम्बन्ध को जोड़ने के लिए सबसे बड़ी बात है परमात्मा के साथ सम्बन्ध जोड़ना| क्योंकि हम सदियों से विश्वास करते हैं कि परमात्मा मात-पिता है, गुरु-शिक्षक है| परन्तु उनकी शिक्षा क्या है, वो किसी को भी मालूम नहीं है, किसी किताब में भी वर्णित नही है|

जितने भी साधू-संत की शिक्षा है वो परमात्मा की शिक्षा नही है, परमात्मा की शिक्षा एक अनोखी शिक्षा है| सामान्यतः ये किताबों में नही है परन्तु ये शिक्षा मैने यहाँ अनुभव की| मैने ग्रन्थ भी पढ़े हैं, शिव सिद्धांतो को भी मैं जानता हूँ, गीता का भी थोडा-थोडा अध्ययन किया था| परन्तु यहाँ जो मुझे अनुभव हुआ वो बिलकुल अनोखा था, आनंद की अनुभूति मुझे प्राप्त हुई|

रुपेश कईवर्त  :    बहुत ही विश्वास से ब्रह्माकुमारिस शुरू से ये कहती आयी हैं कि परमात्मा यहीं आते हैं, यहीं कार्य करते हैं| आपका क्या अनुभव रहा, क्या परमात्मा को आपने देखा, अनुभव किया, या उनसे बात हुई, जीवन जो परिवर्तन की ओर बढ़ता है क्या वो बढ़ पाया? आपकी अनुभूति कैसी रही?

बी.के. मृत्युंजय भाईजी :         सबसे पहली बात कि हम परमात्मा पर सदियों से विश्वास करते आये हैं, कि वो परमशिक्षक है परन्तु शिक्षा तो किसी माध्यम के द्वारा ही दी जाती है| परमात्मा को हम ये भी कहते आये हैं कि वो अजन्मा, अशरीरी है, अभोक्ता है, अव्यक्त है, परन्तु वो शिक्षा कैसे देंगे! लेने वाले भी साकार हैं, तो ज़रूर उनको भी कोई माध्यम की आवश्यकता होगी|

उस माध्यम का अनुभव इस ईश्वरीय विद्यालय में आने के बाद ही मुझे समझ में आया कि भगवान ने प्रजापिता ब्रह्मा बाबा के शरीर में प्रवेश कर के अपनी पहचान भी दी, सारी सृष्टि के आदि-मध्य-अंत का भी ज्ञान दिया, साथ में कर्म-अकर्म-विकर्म की गुह्य गति को भी समझाया, मनुष्यत्मा को पवित्र बनने की विधि भी बताते हैं, परमात्मा से मानसिक सम्बन्ध कैसे जोड़ना है, मनोबल कैसे बढ़ाना है, इसको योग भी कहते हैं और इस योग को करने की विधि भी सिखाते हैं|

उसका अनुभव मैंने इस ईश्वरीय विश्वविद्यालय में आकर किया| ब्रह्मा बाबा के तन में शिवबाबा का सुनाया हुआ महावाक्य मैं धीरे-धीरे सुनने लगा, मुझे उसका निश्चय हुआ| मैं माउंट आबू भी आया, वहां बाबा से मिलने का सुअवसर भी मुझे मिला| वो मेरे जीवन के परिवर्तन की एक महान घड़ी थी, एक वरदान की अनुभूति की घड़ी, निश्चय की घड़ी थी| निर्णय शक्ति, एक महान संग, एक अलौकिक संग की अनुभूति मैने की| ये अविस्मरणीय स्मृति मेरे जीवन में एक नया मोड़ लाई|

रुपेश कईवर्त  :    जैसे हम आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ते हैं, तो कहीं न कहीं जीवन में समस्याएं, विघ्न तो आते ही हैं| कहा जाता है कि अपने मन को जीतना कठिन होता है| आप काफी young age में ही आ गये थे, तो क्या आपका मन सहज रूप से मान गया था या मन संसार की ओर भागता रहा, कि लोग विवाह करते हैं हम भी करके देखें! या लोग खाते-पीते हैं तो हम भी कुछ taste कर के देखें! मन को आपने कैसे समझाया?

बी.के. मृत्युंजय भाईजी :        ये आपने जीवन में आने वाली वास्तविक बातों को टच किया है| मेरे भी परिवार ने सोचा कि आपको इस जीवन में चलना है, तो ग्रहस्थी बन कर के चलो| इसके लिए आप शादी करो| परन्तु उस समय मेरा शादी करने का विचार नहीं था| मुझे बार-बार शादी करने के लिए प्रोत्साहित किया| परिवार में सभी के बीच ये चर्चा का विषय बन गया था कि मैं शादी नहीं करना चाहता हूँ| आखिर में मैने उनसे कहा कि जिस दिन मुझे शादी करनी होगी मैं उस दिन आपको बता दूंगा| परन्तु आजतक वह दिन नहीं आया है!!

रुपेश कईवर्त  :    हम बाहर से तो सबको convince कर लेते हैं, परन्तु हमारे संस्कार भी होते हैं, उनको जीतना इस आध्यात्मिक मार्ग में, कइयों को थोडा वक़्त लग जाता है| आपकी स्थिति कैसी रही? क्या मन को सहज रूप से control किया जा सका, या पुरानी आदते या संस्कार कभी न कभी हावी होते रहे|

बी.के. मृत्युंजय भाईजी :        आपकी ये बात तो सच है, परन्तु मनुष्य के लिए स्वभाविक है कि पूर्व जन्मों के संस्कार किसी तरह से अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश करते हैं| समाज की अनेक विचारधाराओं की वजह से pressurized हो सकता है| परन्तु एक आदत मैने पक्की कर ली थी, अमृतवेले उठना और मुरली सुनना, ईश्वरीय महावाक्यों को सुनना| ये मेरे जीवन की एक प्रक्टिकल आदत हो गयी थी| हम रोज़ मुरली सुनते थे, उसमे मानसिक समस्याओं और संस्कारों का समाधान मुरली में मिल जाता था|

इसके लिए बाबा कहते थे कि पवित्र जीवन जीना है| पवित्रता है तो सुख-शांति की अनुभूति है, पवित्रता एकाग्रता की शक्ति को बढ़ाती है| पवित्रता साइलेंस में रहने की विधि है| ऐसी बहुत सी बातें मैं मुरली के माध्यम से सुनता था| और इधर आने के बाद अनुभव भी होता था| और इस अनुभव के कारण मेरे जीवन में चाहे प्रलोभन कहो, आसक्ति व आकर्षण नहीं हुआ| बाबा कहते हैं कि देह-अभिमान एक तरह से विकार है| देही अथवा आत्म-अभिमानी रहना, आत्मिक स्मृति में रहना, आत्मिक दृष्टि से देखना, आत्मिक भाव से रहना, अनेक आत्माओं को भी आत्मा समझकर चलना – ये शिक्षा एक अमूल्य शिक्षा है| और इस शिक्षा को सुनते-सुनते मन परिपक्व व शक्तिशाली हो जाता है और उस भावना की तरफ़ नहीं जाता है| ये मेरे जीवन के अनुभव हैं|

 

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